हज़ारों वर्ष पूर्व जब इस पावन धरा पर हमारी सभ्यता का बीजारोपण हुआ, तब संस्कृति का विस्तार केवल नगरों की सीमाओं तक सीमित नहीं था। उसकी असली जड़ें उन शांत, सघन और सुरम्य वनों में गहराई से रची-बसी थीं, जहाँ प्रकृति के कण-कण में युगों-युगों की स्मृतियाँ आज भी सांस लेती हैं।
यदि हमें भारत की आत्मा के विशाल स्वरूप को अनुभव करना है, तो हमें महानगरों से होकर प्रकृति की गोद में बसी अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति के आँचल में उतरना होगा। अनादि काल से नगरों, ग्रामों और वनों को आपस में बाँधे रखने वाली एक ऐसी सांस्कृतिक डोर रही है, जिसने सदा भौतिक विकास और प्राकृतिक मर्यादा के मध्य एक सुंदर संतुलन बनाए रखा। भौतिकतावाद के वर्तमान चरम कालखंड में भी, हमारे सरल-हृदय वनवासी समाज ने प्रकृति से उपजी अमूल्य जीवन-पद्धति और लोक-संस्कृति को सहेज कर रखा है।
प्रभु श्री राम और वन संस्कृति का एकात्म भाव
श्री राम के पदचिन्ह लिए यह पावन भूमि आज भी उस विरासत और उनकी यादों को अपने आँचल में समेटे हुए है। निषादराज का निश्छल सत्कार, माता शबरी का अनन्य मातृवत स्नेह और वनवासी वीरों का निष्ठावान साथ—यह सब केवल कथाएँ नहीं, बल्कि नगर और वन के मध्य रचे-बसे उस गहरे, आत्मीय रिश्ते का अमर प्रमाण हैं।
ऐतिहासिक सौहार्द और परस्पर सम्मान
इतिहास के पन्नों में भी राज-व्यवस्थाओं और आदिवासी समाज के बीच का यह पारस्परिक विश्वास और सौहार्द स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। हमारे प्राचीन व मध्यकालीन राज्यों में वनांचल कभी पराया नहीं रहा; राजाओं और वनवासियों के बीच सदैव गहरा आदर, परस्पर सहयोग और आत्मीय नाता रहा, जिसके किस्से-कहानियाँ सुनकर हम बड़े हुए हैं।
षड्यंत्रों से रक्षा और संकल्प
किन्तु आज के युग में, हमारी इसी सनातन सांस्कृतिक डोर पर विघटनकारी शक्तियाँ सुनियोजित प्रहार कर रही हैं। झूठी कहानियाँ गढ़कर और कृत्रिम भेद उत्पन्न करके इस साझी विरासत को बाँटने का कुत्सित प्रयास हो रहा है।
समय है कि हम अपनी इस साझी विरासत के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का भी निर्वहन करें और आदिवासी संस्कृति के साथ अपने आदिकालीन रिश्ते की डोर और मज़बूत करें, ताकि कोई भी शक्ति हमारे युगों पुराने इस आत्मीय नाते को खंडित न कर पाए।