आदिकाल से मानव समाज को संस्कारित और संगठित रखने वाली सबसे सशक्त धुरी यदि कोई रही है, तो वह हमारी भारतीय कुटुंब व्यवस्था है। कुटुंब केवल रक्त-संबंधों से जुड़े कुछ व्यक्तियों का समूह या चारदीवारी का नाम नहीं है। कुटुंब वह पावन तपोभूमि है जहाँ केवल एक परिवार नहीं, बल्कि एक पूरी संस्कृति फलती-फूलती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है।
भारतीय दर्शन में कुटुंब को मनुष्य का अभेद्य सुरक्षा कवच माना गया है। जीवन के उतार-चढ़ाव, मानसिक अवसाद, आर्थिक विपत्ति या सामाजिक संकट—हर परिस्थिति में कुटुंब व्यक्ति के पीछे एक मजबूत दीवार बनकर खड़ा रहता है। संस्कार कभी किताबों से रटवाए नहीं जा सकते; वे आचरण से सीखे जाते हैं। कुटुंब ही वह प्राथमिक पाठशाला है जो चरित्र, मर्यादा, त्याग और सेवा-भाव को जीवन में जीवित रखती है। छोटों के प्रति वात्सल्य, बड़ों के प्रति आदर और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का पाठ कुटुंब की दैनिक दिनचर्या में ही स्वतः सिद्ध होता है। जब कुटुंब सुदृढ़ होता है, तब समाज को भटकने से रोकने वाले नैतिक अंकुश स्वतः काम करते हैं।
आज के दौर में बाज़ारवाद और उपभोक्तावादी शक्तियाँ मासूम बच्चों को अपना सबसे सुलभ शिकार बना रही हैं। स्क्रीन्स, अश्लीलता, अनियंत्रित वासनाएँ और भटकाव भरी प्रवृत्तियाँ बच्चों के कोमल मनों को दूषित करने पर तुली हैं। ऐसे समय में कुटुंब में बुजुर्गों की छत्रछाया ही वह ढाल है जो बच्चों को बाज़ार का शिकार होने से बचाती है। दादा-दादी और नाना-नानी का सान्निध्य बच्चों को केवल कहानियाँ नहीं सुनाता, बल्कि उन्हें जीवन के मूल्य, आत्मसंयम और सही-गलत की पहचान सिखाता है। जहाँ बुजुर्गों का आदर और बच्चों पर उनका वात्सल्य होता है, वहाँ बाज़ार की कुत्सित प्रवृत्तियाँ कभी प्रवेश नहीं कर सकतीं।
कुटुंब व्यवस्था पर सुनियोजित प्रहार
दुर्भाग्य से, पिछले कुछ दशकों में एक सोचे-समझे वैचारिक और सांस्कृतिक षड्यंत्र के तहत भारतीय कुटुंब व्यवस्था की जड़ों पर तीखा प्रहार किया गया है:
- अति-व्यक्तिवाद: खोखली ‘आधुनिकता’ के नाम पर परिवारों को तोड़ा गया।
- स्वार्थ की भावना: ‘हम’ की सुंदर भावना को मिटाकर केवल ‘मैं और मेरा’ की स्वार्थी सोच को महिमामंडित किया गया।
- बुजुर्गों की उपेक्षा: बुजुर्गों को बोझ और पारिवारिक मर्यादाओं को बंधन के रूप में चित्रित करने का सुनियोजित प्रयास हुआ।
इसका सीधा परिणाम आज पारिवारिक बिखराव, अकेलापन, मानसिक तनाव और युवा पीढ़ी के भटकाव के रूप में हमारे सामने उपस्थित है।
हमारा परम कर्तव्य
यदि भारत को अपनी आत्मा, अपनी पहचान और अपने स्वाभिमान को जीवित रखना है, तो इस षड्यंत्र को पहचानना होगा। कुटुंब व्यवस्था को बचाना और पुनः सशक्त करना अब केवल एक सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि हम सबका परम राष्ट्रीय और सांस्कृतिक कर्तव्य है। हमें अपने घरों में संवाद लौटाना होगा, बुजुर्गों की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना होगा और अपने बच्चों को बाज़ार के हवाले करने के बजाय कुटुंब की ममतामयी छाँव में सींचना होगा। जब कुटुंब बचेगा, तभी संस्कृति बचेगी—और जब संस्कृति बचेगी, तभी यह राष्ट्र सुरक्षित रहेगा।