आप सभी को सादर प्रणाम। आज समाज के सामने एक सीधा और कड़वा प्रश्न उपस्थित है: चारों ओर दिन-रात राम-नाम का जयघोष हो रहा है, फिर भी हमारे समाज में दुराचार, व्यभिचार और अराजकता अपनी चरम सीमा पर क्यों पहुँच रही है? यदि देश में इतनी बड़ी संख्या में रामभक्त विद्यमान हैं, तो समाज का यह नैतिक पतन कैसे हो रहा है?
शायद उत्तर उस पुरानी कहावत में छिपा है—मुँह में राम, बगल में छुरी! दुर्भाग्य से आज ऐसे लोगों की संख्या बढ़ गई है, जो राम-नाम की आड़ में अपने स्वार्थ और पाप की दुकान चला रहे हैं। मुँह पर प्रभु का नाम है, लेकिन मन में छल, कपट और अनैतिकता भरी है। समय का लाभ उठाकर ऐसे धूर्त लोग साधन-संपन्न और ताकतवर बन चुके हैं, और पूरा तंत्र अपने अनुसार चला रहे हैं। इसका सबसे बड़ा आघात एक सरल, सच्चे और साधारण व्यक्ति को सहना पड़ रहा है।
सज्जनता का ह्रास और कुप्रवृत्तियों का प्रभाव
हमारी संस्कृति में एक समय ऐसा भी था जब सरल मन वाले सज्जन व्यक्ति का समाज में बहुत मान होता था और वही समाज का मार्गदर्शन किया करते थे। उनके मार्गदर्शन में समाज सतोगुण प्रधान हुआ करता था, घर-घर में सुख एवं शांति का वास होता था, पूरा गाँव एक परिवार की तरह रहता था और उच्चतम मानवीय आदर्शों का चित्रण प्रस्तुत करता था। समाज में निवास करने वाली महिलाएँ एवं पुरुष उच्चतम चरित्र वाले हुआ करते थे और बचपन मासूमियत से भरा था।
किन्तु वर्तमान समय में, जो जितना छली, कपटी एवं धूर्त है, समाज में उतना ही सफल है और दुर्भाग्य से उसी के पास साधनों का नियंत्रण पहुँच चुका है। परिणामस्वरूप जिस प्रकार का तंत्र ये दुष्ट शक्तियाँ तैयार कर रही हैं, उसमें लगातार व्यभिचार, दुराचार और भ्रष्टाचार तेज़ी से फैलता जा रहा है तथा हमारी महान संस्कृति को निगल जाने के लिए आतुर है।
रामत्व का वास्तविक अर्थ
इस प्रकार के विषम वातावरण में मात्र रामत्व ही हमारा एकमात्र आसरा बचा है। मुँह से राम का नाम लेना और श्री राम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारना, दोनों में बहुत अंतर है। राम नाम लेना तो बहुत आसान है, पर रामत्व को अपने भीतर उतारना एक तपस्या है।
- रामत्व का स्वरूप: श्री राम का उच्चतम चरित्र एवं सद्गुण ही रामत्व है और उनके चरित्र को आत्मसात करना ही रामत्व को आत्मसात करना है।
- सत्य और मर्यादा: रामत्व सत्य पर अडिग रहना सिखाता है, उच्चतम चरित्र सिखाता है, न्याय करना और अन्याय न सहना सिखाता है। रामत्व मर्यादाओं को सर्वोपरि रखना सिखाता है।
- अधिकार बनाम कर्तव्य: आज के इस दौर में जहाँ हर व्यक्ति मात्र अपने अधिकारों को लेकर झगड़ रहा है, वहीं रामत्व हमें अपने कर्तव्यों का बोध कराता है। यदि हर कोई बस अपने कर्तव्यों का पालन करे, तो कभी कोई विवाद ही न हो; ये सारे फसाद और क्लेश अधिकारों की अंधी होड़ के कारण ही हैं।
रामराज्य की दिशा
जिस प्रकार आज एक-एक कर परिवार की इकाइयाँ टूट रही हैं, विचार कीजिए कि यदि परिवार का हर व्यक्ति रामत्व को स्वीकारे तो क्या कभी परिवार विघटित हो सकते हैं? इसी प्रकार यदि समाज में रामत्व स्थापित हो जाए, तो क्या यह व्यभिचार और दुराचार टिक सकता है?
इसलिए भारत को केवल विकसित राष्ट्र नहीं, बल्कि चरित्रवान राष्ट्र बनने की आवश्यकता है। और चरित्र का सबसे बड़ा आदर्श प्रभु श्री राम हैं। रामत्व किसी धर्म विशेष तक सीमित विषय नहीं, बल्कि मानवता का सर्वोच्च आदर्श है। जिस दिन समाज ने रामत्व को अपना लिया, उस दिन सच्चे अर्थों में रामराज्य की शुरुआत होगी।